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जज़्बा

Posted in गज़ल, hindi with tags on ઓક્ટોબર 19, 2017 by ruchir

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गिरते सँभलते ही सिखाथा चलना
ना बदलेंगे गिरके सँभालने का जज़्बा!
बनते बिगड़ते बनी है ये दुनिया
की बनने से पहेले बिगाड़ेगा क्या वोह?

गिरायेगा क्या वोह? पछाड़ेगा क्या वोह?
की गिरके पटक के बने सख्त पथ्थर!
तराशा जो पथ्थर तो बनती है मूरत,
न तोड़ें उसे तो तराशेगा क्या वोह?

मारेगा क्या वो मिटाएगा क्या वोह?
के मरने से मिटती नहीं है शहीदी|
शहीदों के ख़ूनों से बनते हैं भारत
न खौला अगर तो बहायेगा क्या वोह?

हंसते हँसाते रहें ना रहें हम
मगर ना तू करना जुदाई का एक ग़म|
मिलते बिछड़ते कटी ज़िन्दगी है
कभी ना भूला – याद करने का जज़्बा!

( एक नई ग़ज़ल, उन ख़ास बहादूर जवानों के नाम के नाम, जिनके सरहद पर डटें होने से, आज हम सब चैन से इन त्योहारों की खुशियां मन सकते हैं|..)

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